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Brucellosis

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Avian influenza

Table of Contents   चर्चा में क्यों ? हाल ही में वर्ल्ड ऑर्गनाइज़ेशन फॉर एनिमल हेल्‍थ (World Organization for Animal Health-OIE) ने घोषणा की है कि भारत बर्ड फ्लू के नाम से पहचाने जाने वाले खतरनाक एवियन इन्फ्लूएंजा (Avian Influenza) यानि H5N1 वायरस से मुक्त हो गया है। प्रमुख बिंदु

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African swine fever

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Bluetongue

Table of Contents ब्लूटंग वायरस ब्लूटंग वायरस सभी जुगाली करने वालों को संक्रमित कर सकता है लेकिन यह आमतौर पर केवल भेड़ों में गंभीर बीमारी का कारण बनता है। मवेशी वायरस से संक्रमित हो सकते हैं लेकिन बीमारी शायद ही कभी दिखाई देती है। एक कीट वेक्टर वायरस फैलाता है और

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Dagnala disease

Table of Contents दुधारू पशुओं का डैग्नाला रोग इसे पुँछकटवा रोग के नाम से भी जानते हैं। यह रोग फफूंदी के विष से मुख्यतया: भैंस में होने वाला रोग है जो आमतौर पर फफूंदी संक्रमित धान का पुआल खाने से होता है इस रोग से ग्रस्त पशु की टांगों, पूंछ,

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Arum

Table Of Content अरुम या ऐरम ऐरम क्या है? ऐरम का इतिहास ऐरम के प्रकार अन्य भाषाओं में ऐरम के नाम ऐरम के फायदे ऐरम के नुकसान ऐरम के पौधे की देखभाल कैसे करें ऐरम के पौधे का सांस्कृतिक उपयोग ऐरम का पौधा कहां पाया जाता है अरुम या ऐरम

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भूमि का चुनाव और तैयार करना

अदरक हिमाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण मसालेदार नगदी फसल है। इसकी काश्त के लिए 5-6.5 पी.एच. रेंज और एक प्रतिशत से अधिक जैविक कार्बन वाली रेतीली अथवा भंगुर मृदा काफी उपयुक्त है। यदि जैविक कार्बन की मात्रा एक प्रतिशत से कम है, 25-30 टन/हेक्टेयर कार्बनिक खाद एफ.वाई.एम. का प्रयोग करें और खाद को भलीभांति मिलाने के लिए खेत की 2-3 बार जुताई करें। प्रमाणित जैविक खेतों को प्रतिबंधित सामग्रियों के प्रवाह से रोकने के लिए प्रमाणित जैविक खेतों और अजैविक खेतों के बीच लगभग 5-10 मीटर की दूरी की पर्याप्त सुरक्षा पट्टी दी जाए। भूमि को तैयार करते समय कम से कम जुताई की जाए। सामान्यतः क्यारियों के बीच 10 मीटर की चौड़ाई, 15 सै0मी0 की ऊंचाई और 3-6 मीटर की लंबाई वाली 30 सैं0मी0 चौड़ी क्यारियां बनाई जाती हैं। क्यारियों के लिए सूर्य की रोशनी पीड़कों और बीमारीजनक जीवों के गुणन को रोकने में लाभकारी है।
बुआई का समय-

  • निचले पर्वतीय क्षेत्र : मध्य जून
  • मध्य पर्वतीय क्षेत्र : मध्य अप्रैल-मध्य मई
  • ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र : अप्रैल
  • अनुमोदित किस्में
    हिमगिरी : स्थानीय क्लोन धर्जा लोकल से क्लोन चयन द्वारा विकसित किस्म अधिक पैदावार देने वाली तथा गट्ठी सड़न रोग से कम ग्रसित (8-10 प्रतिशत), क्षेत्र-1 तथा 2 के लिए अनुमोदित किस्म।

    रोपण

    रोपण के लिए 18-22 क्विंटल/हेक्टेयर (150-180 कि.ग्रा./बीघा) की बीज दर सर्वोत्तम मानी जाती है। प्रत्येक गट्ठी का वजन 20-30 ग्राम तथा उन पर 1-2 आंखों का होना आवश्यक है। बीज के लिए स्वस्थ गांठों का चयन करें और 3-4 सै.मी. की गहराई पर बिजाई करें। अदरक के रोपण में पंक्तियों के बीच 25-30 सें.मी. और पौधों के बीच 15-20 सें.मी. का अंतराल दिया जाना चाहिए। मक्की की फसल का प्रयोग अदरक में छाया देने के लिए किया जाता है। इसके लिए अदरक की हर तीसरी कतार के बाद मक्की की एक कतार लगाएं। भूमि में सुधार लाने, तापमान बनाये रखने, भूमि का कटाव रोकने तथा उपयुक्त नमी बनाये रखने हेतु क्यारियों को हरी या सूखी पत्तियों या गोबर की खाद से ढककर रखा जाता है। एक हैक्टेयर जमीन में 50 क्विंटल सूखे पत्ते या 125 क्विंटल हरे पत्तों की 3-5 सें.मी. मोटी मल्च की तह बना दें। यदि पहली मल्च सड़ जाये तो 40 दिन के बाद दूसरी बार मल्च की तह लगायें।

    मृदा प्रबंधन

    रोपण के समय अच्छी तरह सड़ा हुआ मवेशियों का गोबर अथवा कम्पोस्ट 25 - 30 टन/हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, 2 टन/हेक्टेयर के हिसाब से नीम की खली के प्रयोग का परामर्श दिया जाता है। घासपात की पलवार जरूरी है क्योंकि इससे अंकुरण में बढ़ोत्तरी होती है। छनन और जैविक तत्वों में वृद्धि होती है। सूक्ष्मजीवी गतिविधि और पोषण तत्वों की उपलब्धता में बढ़ोत्तरी के लिए मल्मिंच के बाद गाय के गोबर के घोल अथवा पानी में मिलाई गई खाद को क्यारियों के ऊपर छिड़का जा सकता है।

    सिंचाई और पानी की आवश्यकता

    अप्रैल-मई माह में उगाई जाने वाली फसल को शुरूआत में 7 दिनों के अंतराल पर मृदा की किस्म के आधार पर 2-4 बार पानी लगाए जाने की जरूरत होती है। इसके बाद फसल को मानसून की बारिश से पानी मिलता है और सितंबर के अंत तक यह मानसून अच्छी तरह आ जाता है। इसके परिणामस्वरूप, फसल को अक्तूबर के मध्य से लेकर और दिसंबर के अंत में 15 दिन के अंतराल पर पानी दिए जाने की आवश्यकता होती है। अदरक की खेती में अंकुरण, प्रकंदन का प्रारंभ और प्रकंदन का विकास सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण अवस्थाएं हैं। पौधों के बेहतर टिकाव के लिए सर्वश्रेष्ठ जलनिकास के लिए रूके हुए पानी के बहाव के लिए क्यारियों के बीच उचित बहाव मार्ग का परामर्श दिया जाता है।

    परंपरागत विधियां और रखरपतवार का प्रबंधन

    खरपतवार को नियंत्रित करने और उच्च उत्पादकता के लिए फसल आवर्तन, हरी खाद और पंक्तियों के बीच में किसी अन्य फसल की बुआई सर्वोत्तम रास्ता है। अदरक में मिर्च, बैंगन, अरबी, हल्दी, तिल और विभिन्न फलीदार फसलों के साथ मिश्रित खेती की जाती है। अदरक की फसल में सामान्यत: दो-तीन बार खरपतवार हटाया जाता है। पहली बार खरपतवार दूसरी मल्चिंग से पूर्व किया जाना चाहिए, जो 45-60 दिनों के अंतराल पर दोहराई जाती है। खुदाई करते समय इसके लिए ही संभव सावधानी बरती जानी चाहिए कि प्रकदन को क्षति, नुकसान न पहुंचे अथवा वह बाहर न दिखाई दे।

    फसल की सुरक्षा

    (अ) कीट प्रबंधन शुट बोरर
    • लार्वे तने में छेद कर देते हैं और आंतरिक उत्तकों को खा जाते हैं। जिसके परिणामतः संक्रमित शाखा के पत्ते पीले पड़कर सूख जाते हैं। जिनके जरिये कीट बाहर निकल जाता है और कीट से ग्रस्त होने का सबसे प्रमुख लक्षण मुरझाया और पीला केन्द्रीय अंकुर होता है।
    • खोखले संक्रमित अंकुरणों को खोलकर सैंडी को हाथ से बाहर निकाल कर नष्ट किया जाता है। कीटों के विरोध के लिए अदरक की फसल के साथ-साथ नीम के पेड़ लगाएं।
    प्रकन्द कीट
    • इससे खेत और भण्डारण में प्रकन्द में कीड़ा लग जाता है। वे इसके रस को खाते हैं। और जब प्रकन्द काफी अधिक पीड़ित हो जाते हैं, वे इसके अंकुरण के बाद प्रभावित हो मुरझा जाते है और सूख जाते हैं।
    अत्यधिक पीडित प्रकन्दों को हटा दें और उनका भंडारण न करें। खराब हुए पत्तों को एकत्र कर नष्ट कर दें। बीज सामग्री, प्रकदों के भंडारण के लिए कीट संक्रमण से मुक्त स्वस्थ प्रकंदों को चुनें। 1:1 के अनुपात में स्ट्राइकोनॉस नक्सवोमिका + बुरादा परजीवियों के साथ-साथ कीट संक्रमण से बीज प्रकंदों को मुक्त रखने में मददगार है। फाइकस कम्पेरी से प्रकंदों में कीट की संख्या में 80 प्रतिशत कमी और प्रीडेटरी बीटल कोकोबीयस एस.एस.पी. भी प्रभावी पाया गया, 10 टन/है0 के हिसाब से अच्छी तरह सड़ा हुआ भेड़ का खाद दो बार छिड़काव करते हुए अथवा पोल्ट्री की खाद दो बार छिड़काव में प्रयोग करें।
    सफेद कीट
    • इस कीट के लार्वे पोषक जड़ों और प्रकंदों को खाकर जीवित रहते हैं। प्रजनन काल के दौरान व्यस्क कीटों को एकत्र कर समाप्त करने से इस कीट से निपटा जाता है, इस कीट से निपटने के लिए गाय के गोबर के साथ एन्टोमोफागस फन्गस मिटारिजियम एनिसोपिल का प्रयोग भी प्रभावी है।
    (ब) रोग प्रबंधन नरम सड़न
    • इस बीमारी के आरंभ से निचले पत्तों की नोक पीली होनी प्रतीत होती है जो धीरे – धीरे पूरे पत्तों और खाली जगहों सहित पत्तों से जुड़े आवरण तक फैल जाता है, जिसके बाद वह मुरझा कर सूख जाते हैं। छद्म तने के कॉलर क्षेत्र में हल्का पीला पारभासी भूरा रंग दिखाई देने लगता है, जो पैरेनकाइमा उत्तकों के नष्ट होने के कारण पानी में गीला हो जाता है।
    • खेती के लिए रेतीली दुमट मृदा में उचित प्रवाह के स्वस्थ फसल, बीमारीग्रस्त पौधों को समूल उखाड़ना और जलाना, रोपण के लिए बीमारी रहित प्रकंद का प्रयोग, मृदा को सूर्य की रोशनी मिलना सुनिश्चित करना होता है।
    • अदरक के इस रोगकारक के दमन के लिए ट्राइकोडरमा हरजियानम टी. हरमेटम, टी. वायरनस और बैक्टीरियल आइसोलेट्स बैसिलियस और सुडोमोनॉस फ्लोरोसेंस प्रभावशाली पाए गए हैं।
    पत्तों पर धब्बे यह रोग जुलाई से अक्तूबर माह के दौरान पत्तों पर देखा गया है। पत्तों पर अंडाकार से अनियमित जल में तिरोतित धब्बे उभर आते हैं। पत्ते कागजनुमा बन जाते हैं और रंग-बिरंगे छिद्र उभर आते हैं। पत्तों की सतह पर काले बिंदुओं जैसे आकार बन जाते है।
    • रोपण के लिए ऊंची उठी हुई भलीभांति जल प्रवाह वाली भूमि का चुनाव | करना चाहिए। प्रकंदों को जैव नियंत्रक तत्वों जैसे टी. हरजियानम से संसाधित किया जा सकता है, पर्याप्त नियंत्रण के लिए भारी वर्षा के आगमन से पूर्व 15 दिन के अंतराल पर एक प्रतिशत बॉरडिक्स मिश्रण के 6 छिड़काव किए जाएं।
    जीवाणु जनित कुम्लाहट यह रोग दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दौरान होता है, जब फसल तरूणावस्था में होती है। जल तिरोतित धब्बे छद्म तने कॉलर क्षेत्र में उभरते हैं और ऊपर-नीचे की ओर फैलते हैं, बाद में पत्ते की और आगे बढ़ता है। प्रभावित छद्म तना और प्रकंद को जब हल्के से दबाया जाता है तो इसकी संवहनी शिराओं और दुग्धनुमा द्रव्य निकलता है।
    • इस रोग को नियंत्रित करने के लिए जीवाणुओं के फैलने को रोकने हेतू रोगिंग के बिना गाय के मूत्र से भिगोना प्रभावी पाया गया था, जैव नियंत्रक तत्वों जैसे स्यूडोमानास फ्लोरोसेंस टी. हैजियानम और बैसिलस के मिश्रण सहित मृदा में सुधार, खाद्यान्न जैसे गैर - परपोशी पौधों जैसे चावल, बाजरा, गेहूं आदि के साथ अवर्तन को भी प्रभावी पाया गया है।
    गट्ठी सड़न रोग इस रोग से प्रभावित पौधों के पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा उन पौधों के डंठल जमीन की सतह से नरम पड़ने के पश्चात जमीन पर गिर जाते हैं। इस प्रकार रोगी पौधों की गांठे नरम तथा पिलपिली पड़ जाती हैं। अंदर की रेशेदार उत्तिकाओं को छोड़कर अन्य सभी उत्तिकाएं गलकर सड़ जाती हैं तथा रोगी पौधे सूखकर जमीन पर गिर जाते हैं। प्रायः सूत्रकृमि या कीड़े गांठों में छेद करते हैं जहां से फफूद आसानी से प्रवेश करके गांठों में सड़न रोग उत्पन्न करता है। इस रोग का फैलाव रोगी गांठों द्वारा होता है। फफूद का स्थान बीज के छिलके के नीचे होता है तथा यह रोग मिट्टी से अदरक के पौधे तक कम मात्रा में फैलता है। रोकथाम :
    • निरोगी बीज गठ्ठियों का चयन करें।
    • भंडारण से पहले पूर्ण गांठों को ट्राईकोडर्मा या बीजामृत से उपचारित करें तथा उपचारित बीज को खातियों में डालें।
    • उपचार की गई गठियों को छाया में उस समय तक सुखाएं जब तक ऊपर की सतह नमी रहित हो जाए।
    • अदरक की बिजाई के लिए खेत की भूमि को सही ढंग से तैयार करें। खेत में कम से कम तीन-चार बार हल चलाएं। इससे फफंद, सूत्रकृमि तथा कीड़े सतह पर आकर धूप से मर जाते हैं, जो कि अदरक की गठियों तथा जड़ों में छेद करते हैं।
    • जुताई के समय खेतों को जीवामृत से उपचार करें।
    • खेतों में जल निकास का विशेष प्रबंध करें। यदि खेत में पानी खड़ा होगा तो सड़न रोग लगने व फैलने की अधिक संभावना होती है।
    • अगस्त माह में पौधों पर प्रायः इस रोग के लक्षण आने शुरू हो जाते हैं। समय फसल में पंचगव्य का छिड़काव करें।
    • यदि अदरक फसल को बीज के लिए रखना हो तो इसमें से मात गांठे न  निकालें क्योंकि इस प्रकार के घाव सड़न रोग को फैलने में सहायक होते हैं।
    • खेतों में समय-समय पर मिट्टी चढ़ाएं क्योंकि इससे भी इस रोग के फैलाव में कमी आती है।
    • खेतों से दो-तीन बार खरपतवार निकालें।
    • कम से कम तीन वर्ष का फसल चक्र अपनाएं।
    जड़ ग्रन्थि सूत्रकृमि सूत्रकृमि अदरक व इसकी जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए अदरक पर इनसे सीधे होने वाले नुकसान के अतिरिक्त यह अन्य सूक्ष्मजीवियों को फसल में प्रवेश करने तथा इनके बढ़ने में भी दो प्रकार से सहायता करते हैं : (क) जड़ों को खाने व इनके अंदर प्रवेश करते समय यह जो घाव अदरक व उसकी जड़ों पर छोड़ते हैं उनमें से फफूद आसानी से अदरक के अंदर पहुंच जाती है। (ख) सूत्रकृमि अदरक के जिस उत्तक को खाता है, उसको मुलायम बना देता है और फफूद आसानी से बढ़ता हुआ फैलता है और सड़न रोग एक भयंकर रूप ले लेता है, जिससे अदरक की पैदावार 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है। रोकथाम
    • अदरक के बीज को बोने से पहले गर्म पानी (45° सै.) में 2-3 घंटे तक भिगोने से तथा मिट्टी में किसी एक खल (नीम, सरसों, महूआ, करंज) का प्रयोग किया जा सकता है।
    • एक पौधा अदरक तथा एक पौधा शिमला मिर्च या एक पंक्ति अदरक व एक पंक्ति शिमला मिर्च लगाने से अदरक के दो मुख्य सूत्रकृमियों के प्रकोप को तथा अदरक की फसल को इनसे होने वाली हानि से रोका जा सकता है।
    कटाई ताजे अदरकों के लिए फसल की कटाई पूरी तरह परिपक्व होने से पूर्व ही कर ली जानी चाहिए। जब प्रकंद नरम हो, तीखापन और रेशे की मात्रा कम हो जो सामान्यतः रोपण के बाद पांचवें माह होता है। अदरक के संरक्षण के लिए इसकी कटाई 5-7 माह के बाद की जानी चाहिए, जब पूर्ण परिपक्व सूख मसाले और तेल के लिए कटाई का सर्वोत्तम समय होता है अर्थात् रोपण के बाद 8-9 माह के बीच पत्तों का रंग पीला होना शुरू होता है। रोपण सामग्री के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले प्रकंदों की कटाई पत्तों के पूरी तरह सूख जाने पर की जानी चाहिए।
    भंडारण भण्डारण के लिए रोगमुक्त मोटी तथा फूली हुई गठ्ठियों का चयन करें। स्वस्थ बीज तुड़ाई के समय मातृ गांठों से चुनें। बीज का अदरक भंडारण करने से पहले खत्तियों को गाय के गोबर + गौमूत्र से उपचारित करें तथा अदरक के बीज को ट्राईकोडर्मा व बीजामृत से उपचारित करें। उपचारित बीज को इन गड्ढों/वत्तियों में डालें तथा ऊपर से लकड़ी के तरव्ते से ढकें। हवा के उचित आवागमन के लिए तरस्ते में छेद करें और बाकी भाग को गोबर से लेप दें। अदरक का भंडारण गड्ढों में किया जाता है जो पूरी तरह सूखे पत्तों/बुरूदे की 30 सें.मी. मोटी परत से ढकी होनी चाहिए और प्रकंदों की प्रत्येक परत 30 सें.मी. से ढकी होनी चाहिए। बारिश, पानी व सीधी धूप से सुरक्षा करने के लिए इन गड्ढों को फूस से बनी छत के नीचे खोदा जाना चाहिए। गड्ढों की दीवारों को गाय के गोबर के घोल से लीपा जा सकता है। ताजे अदरक का भंडारण 10-12 डिग्री सैल्सियस तापमान और 90 प्रतिशत आर्द्रता पर शीतल कक्ष में किया जाना चाहिए। पॉलीथिन बैग में 2 प्रतिशत वायू आवागमन (वेंटीलेशन) में भंडारण से निर्जलीकरण और विकृत विकास की रोकथाम होती है।
    उत्पादकता औसत उत्पादकता 10-15 टन/है0 (8-12 क्विंटल/बीघा) तक होती है तथापि शुष्क अदरक की उपज 20-22 प्रतिशत तक होती है।
    अदरक से सौंठ तथा सफेद सौंठ बनाने की विधि सौंठ बनाने के लिए कंदों को बिजाई के 7-8 महीने बाद निकालें, जब पत्ते पीले पड़कर जमीन पर गिरना शुरू कर दें। कंदों को अच्छी तरह पानी से धोएं ताकि मिट्टी तथा जड़े कन्दों से साफ हो जाएं। इसके उपरान्त बांस या लकड़ी के चाकु बनाकर कंदों के छिलकों को निकाल दें तथा इस बात का ध्यान रखें कि छिलका गहरा न निकले। छिलका निकालने के लिए लोहे के चाक का प्रयोग न करें। अदरक के कदों का छिलका निकालने के लिए ड्रम का प्रयोग भी किया जाता है। छिलका निकालने के बाद कंदों को 8-10 प्रतिशत नमी तक धूप में सुखाएं।
    सफेद सौंठ बनाना उपरोक्त विधि द्वारा सुखाए गए अदरक को चूने के पानी (10-20 ग्राम चूना /लीटर पानी) में 4-6 घंटे तक डुबोएं तथा निकालने के उपरांत धूप में सुखाएं। इस विधि को 2-3 बार तक दोहराएं ताकि सौंठ का रंग सफेद हो जाए।
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