जई(Jaee)

भूमि : जई सभी प्रकार की कृषि योग्य भूमि में पैदा हो सकती है | यह हर तरह की मिट्टी में उगाई जाती है। अच्छे जल निकास वाली चिकनी रेतली मिट्टी, जिस में जैविक तत्व हों, जई की खेती के लिए उचित मानी जाती है। जई की खेती के लिए 5-6.6 पी एच वाली मिट्टी बढ़िया होती है।

तापमान : जई की बिजाई के लिए मुख्यतया 20-25 डिग्री C तापमान होना चाहिए।

उचित समय : 20 अक्टूबर से 10 नवम्बर के बिच का समय बढ़िया माना जाता है।

भूमि की तेयारी : नरमा या धान की कटाई के बाद भूमि की बुवाई करके उसमे पानी दे | पानी देने के 7-10 दिन (मौसम के अनुसार) भूमि में 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रूढ़ी की खाद डालकर या 25 Kg नत्रजन, 40 Kg सुपर और 20 की पोटाश प्रति हेक्टेयर डालकर दोबारा से बुवाई करे | बुवाई के लिए कुल्तिवेटर – तोई – हेरो इत्यादी का इस्तेमाल करें।

उच्चतम वैरायटी : उन्नत प्रजातियां जैसे वाहर जई-1, जई-2, जई-03-91, कैंट, ओ.एस.-6, जे.एच.ओ. 822 या जे.एच.ओ. 851 का शुद्ध प्रमाणित और अच्छे अंकुरण वाला बीज विश्वसनीय स्थान से बोनी के पूर्व सुरक्षित करें।

बीज की मात्रा : चारे के लिये बोई गई फसल के लिये 100 किलोग्राम बीज प्रति हे. बोना चाहिये । किंतु दाने के लिये केवल 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।

बीज उपचार : बीजों को बुवाई से पहले कप्तान या थीरम 3 ग्राम से प्रति किलो बीज से उपचार करें। इससे बीजों के फफूंदी वाली बीमारियों और बैक्टीरिया विषाणु से बचाया जा सकता है।

बिजाई का तरीका: जई की बिजाई 2 तरीके से कार सकते है छिटा विधि और कतारों में | बिजाई के लिए कतारों की दुरी 25 cm तक होनी चाहिए | बीज की बोनी 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई में करना चाहिये|  

सिंचाई : बिजाई के 25 से 30 दिन के अंदर पहली सिंचाई करें और पहली सिंचाई के साथ 25-30 Kg प्रति एकड़ यूरिया खाद डालें| बिजाई के 50 से 60 दिन के अंदर दूसरी सिंचाई करें| दूसरी सिंचाई के साथ 25 Kg नत्रजन डालें | उसके बाद क्रमशः 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें | जई की खेती के लिए 4-5 सिंचाई की आवश्यकता होती है|

उर्वरक : पहली सिंचाई के साथ 25-30 Kg प्रति एकड़ यूरिया खाद डालें| दूसरी सिंचाई के साथ 10 Kg नत्रजन प्रति एकड़  डालें |

खरपतवार :चारे के लिये बाई गई फसल में निंदाई की आवश्यकता कम होती है । क्योंकि पौधों की संख्या अधिक होने के कारण खरपतवार पनप नहीं पाते हैं, किन्तु बीज उत्पादन के लिये ली जाने वाली फसल खरपतवार नियंत्रण लाभप्रद होता है । चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिये 500 ग्राम 2, 4-डी का उपयोग 600 लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर घोल कर छिड़काव करें।

रोग नियंत्रण :

चेपा या माहू : इस रोग का प्रकोप पौधे की पत्तियों पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पत्तियों पर छोटे आकर के बहुत सारे जीव समूह में दिखाई देते हैं | जो पौधे की पत्तियों का रस चूसकर उन्हें सुखा देते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर डाइमेथोएट का छिडकाव करना चाहिए.

पत्ती धब्बा या झुलसा रोग : पौधों पर इस रोग की वजह से पत्तियों पर काले रंग के छोटे छोटे धब्बे बनते हैं | जो धीरे धीरे बड़े होते जाते हैं | बड़े होने के साथ ही इनका मध्य का रंग काला और किनारों का रंग पीला दिखाई देने लगता है | इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम के तेल या पानी का छिडकाव करना चाहिए.

दीमक : जई की फसल में दीमक का रोग किसी भी अवस्था में देखने को मिल सकता है | इस रोग की वजह से पैदावार पर सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है | इस रोग की रोकथाम के लिए खेत को बीज बोने से पहले फिप्रोनिल से उपचारित कर लेना चाहिए | और अगर रोग खड़ी फसल में लगा हो तो इमिडाक्लोप्रिड की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए |

अब फसल पकने का इंतजार करें – जई के पौधों की कटाई चार से पांच महीने बाद जब फसल अच्छे से पककर तैयार हो जाए तब करनी चाहिए | फसल के पकने पर पौधे का रंग हल्का पीला दिखाई देने लगता है | इसके अलावा बीज हलके कठोर होकर काले दिखाई देने लगे तब इसकी कटाई कर लेनी चाहिए | कटाई करने बाद इसकी पुलियों को दो से तीन दिन खेत में सूखने के लिए छोड़ दें | जब पुलियां अच्छी तरह सुख जाए तब इन्हें एक जगह एकत्रित कर मशीन की सहायता से निकलवा लेना चाहिए |

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